राजधानी के पास के बसे इस गांव में कभी गर्मी की छुट्टी मनाने मायके नहीं आती बेटियां, जानिए क्यों...!

भोपाल राजधानी के पास बसे सीहोर जिले की श्यामपुर तहसील का सतोरनिया गांव भीषण जल संकट से जूझ रहा हैं।यहां के लोग डेढ़ से दो किलोमीटर का सफर निश्चित कर दूर खेतों के बोर और पुराने कुआं में सीढिय़ों के होकर नीचे उतरकर पानी ला रहे हैं। वैसे तो यह गांव आर्थिक रूप से सक्षम है, लेकिन गर्मियों के दिन में यहां पर किसी के घर कोई मेहमान भी आ जाए तो अखरता हैं।मेहमान के नहाने और पीने के लिए स्वच्छ पानी की व्यवस्था करना यहां के ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होता है, इसलिए यहां के लोग चाहते हैं कि गर्मी के दिनों में कोई मेहमान नहीं आए। गर्मी की छुट्टियों में यहां के लोग अपनी बेटियों को बुलाने में भी नकरते हैं।

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ऐसा नहीं है कि सतोरनिया गांव के पेयजल संकट से प्रशासन और जनप्रतिनिधि वाकिफ नहीं हैं, यहां के जल संकट को खत्म करने के लिए सरकार ने साल 2017 में सात लाख 40 हजार रुपए की नलजल योजना स्वीकृत की, लेकिन यह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। पानी सप्लाई के लिए पाइप लाइन तो बिछी है, लेकिन टंकी अभी तक नहीं बनी हैं।गर्मी के दिनों में दो हजार से ज्यादा की आबादी वाला मालवा का यह गांव राजस्थान के किसी रेगिस्तान के किनारे बसे गांव जैसा लगता हैं।

महिलाएं खाली बर्तन लेकर चिलचिलाती धूप में लाइन लगाकर खेतों पर इधर से उधर भटकती दिखती हैं। हर कोई व्यक्ति इसका दर्द समझता है, लेकिन मरहम कोई नहीं लगाता हैं।ग्रामीणों ने बताया कि जब भी कोई जनप्रतिनिधि गांव आता है, हम सबसे पहले पेयजल संकट से मुक्ति दिलाने की गुहार लगाते हैं, लेकिन अभी तक सिर्फ आश्वासन ही मिला है, परेसानी तस की तस बनी हुई हैं।

गांव के सात हैंडपंप, पांच खराब


श्यामपुर के सतोरनिया गांव में पानी के लिए जद्दोजहद पूरे साल बनी रहती हैं। बारिश और सर्दी में तो हैंडपंप से काम चल जाता है, लेकिन गर्मी से जलस्तर नीचे जाने के कारण भीषण जल संकट पैदा हो जाता हैं। गांव में पेयजल सप्लाई के लिए पीएचई के सात हैंडपंप हैं, जलस्तर नीचे जाने के कारण पांच हैंडपंप सूख चुके हैं, और दो रूक-रूक कर पानी दे रहे हैं। हैंडपंप के साथ छोडऩे को लेकर ग्रामीण महिला, पुरूष और बच्चे डेढ़ से दो किलो मीटर का सफर निश्चित कर प्यास बुझाने की जुगाड़ करते रहते हैं।

तीस फीट गहरे कुआं में उतरकर निकाले पानी

गांव में एक किसान का करीब 30 से 32 फीट गहरा कुआं हैं।इस कुआं में रूक-रूक कर पानी एकत्रित होता रहता हैं। रात को कुुआं में जो पानी एकत्रित होता है, ग्रामीण उसे मोटर से निकालकर भर लेते हैं, लेकिन दिन में पानी कम रह जाता है, जिसके कारण मोटर पानी खींच नहीं पाता हैं। इस स्थिति में दिन के वक्त ग्रामीण महिला, पुरुष और बच्चे सीढिय़ों से होकर कुआं में नीचे उतरकर पानी भरते हैं। इस दौरान हादसे का भर भी बना रहता हैं।

कौन क्या कहता है....
- गांव में पानी का भयंकर संकट है, का करें, खेत स्थित ट्यूबवेल, कुएं से लाकर काम चला रहे हैं। तीन महीने से यह स्थिति होने के बाद भी परेसानी को कोई देखने नहीं आया हैं।

नूर जहां बी, महिला
- चूल्हा-चौक छोड़कर अलसुबह से पानी लेने के लिए निकलते हैं, उसमें दोपहर हो जाती है जिससे दूसरे कामकाज नहीं होता हैं।इससे बहुत परेशानी का सामना करना पड़ रहा हैं।

किरणबाई विश्वकर्मा, महिला
- गांव में पानी के कोई स्त्रोत नहीं हैं। हैंडपंप बंद हो चुके हैं, नलजल योजना का काम अधूरा हैं। इससे इधर उधर से पानी लाकर प्यास बुझा रहे हैं। शिकायत करने के बाद भी सुनवाई नहीं हुई ।

अनवर अली, ग्रामीण
- सतोरनिया गांव में पर्याप्त पानी के कोई स्त्रोत नहीं हैं। गर्मी के सीजन में यहां लोग अपने रिश्तेदार और बेटियों तक को नहीं बुलाते हैं। रिश्तेदार आ जाए तो उसके पीने को, नहाने को पानी कहां से लाएं। पानी सबसे बड़ा संकट हैं।

एमएस मेवाड़ा, समाजसेवी
- गांव में एक महीने पहले ही पेयजल सप्लाई के लिए हमने एक बोर में मोटर लगाई हैं। यदि ग्रामीणों को परेसानी है तो मैं अभी दिखवाता हूं। गांव में पेयजल सप्लाई के इंतजाम किए जाएंगे।
एसके जैन, ईई पीएचई सीहोर