इसको कहते हैं गरीबी और मजबूरी, बाप ने अपने ही जिगर के टुकड़े को रखा गिरवी..!

पैसे के लिए आपने जमीन संपत्ति और गहनों को तो गिरवी रखने के बहुत किस्सें सुने और देखें होंगे। किन्तु राजस्थान के बांसवाड़ा जिले का एक ऐसा गांव जहां मजबूरी के चलते चंद रुपयों के लालच में एक पिता ने अपने कलेजे के टुकड़े का बचपन गिरवी रख दिया। उसके बाद पिछले तीन वर्ष से मासूम ने न स्कूल की शक्ल देखी और न ही होली दिवाली मनाई।

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इसके अलग बेहिसाब काम का बोझ झेलते हुए मारपीट सही वो अलग। ये व्यथा है घाटोल उपखंड के सुंडई निवासी राजू पुत्र मोहन चारेल की जो इस वक़्त बाल कल्याण समिति की निगरानी में अस्थाई तौर पर किशोर गृह में रह रहा है। गत दिनों उसे उज्जैन की चाइल्ड लाइन ने गडरिये के चगुल से छुड़ाया था और बाल कल्याण समिति बांसवाड़ा को सौंपा था। खमेरा पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार विषय में गडरिये तुलसी राम और बिचौलिये पर प्रकरण दर्ज कर गिरफ्तार किया है।

इन तीन वर्षों में कभी कोई त्योहार नहीं मनाया


तीन वर्ष गडरिये के पास रहा राजू के मुतातिबक उसकी उम्र अभी 12 वर्ष है और वह तीन वर्ष पाली निवासी तुलसी राम गडरिये के साथ भेड़ चराने का काम रहा था। पिता ने मुझे गडरिये के पास दो हजार रुपए महीने के हिसाब से गिरवी रखा था। दूसरे वर्ष गडरिये ने ढ़ाई हजार रुपए महीने के हिसाब से दिए और तीसरे वर्ष तीन हजार रुपए। इन तीन वर्षो में वह बस तीन बार घर गया।

मासूम ने अपनी दास्तां सुनाते हुए कहा कि वो मुझे खूब काम कराता, मारपीट भी करता था। किन्तु मेरी कभी भागने की ताकत नहीं हुई। वह सिर्फ वर्ष में एक बार घर जाने देता था। राजू ने बताया कि पिछले तीन वर्षों में वो घर तो अवश्य आया पर इन दिनों में उसने न तो कभी होली देखी और न ही दिवाली। 12 महीने हो जाने के बाद ही गडरिया उसे घर जाने देता था तो इससे वो इन तीन वर्षो में किसी त्योहार में उपस्थित न हो सका।

स्कूल जाने की मंशा जताई


सीडब्ल्यूसी सदस्यों से राजू ने स्कूल जाने की भी मंशा जताई है। उसने बताया कि वो स्कूल जाना चाहता है। तीन वर्षों से वो स्कूल नहीं जा पाया। वो पढ़-लिखकर आगे बढऩा चाहता है। आज जब मीडिया की टीम चगुई गांव पहुंची तो चौकाने वाला वर्ष सामने आया। गांव मे ना लाईट ना रोड़, शिक्षा भी ना के बराबर है। जिसके चलते परिजन अपने बच्चों को गडरियों के पास चंद रुपये में गिरवे रख देते हैं। गांव के ही लोगों से जब बच्चे गिरवे रखने के कारण पूछा तो उन्होंने चौंकाने वाला पर्दाफाश किया। बोले गांव में रोजगार की कमी के चलते मजूरबन परिजन अपने बच्चों को शिक्षा नहीं दे पाते और रुपये की आवशयकता के लिए अपने घर के चिराग को गिरवीरख देते हैं। गांव के एक युवक ने बताया कि अभी भी गांव के कुछ और भी लड़के गिरवी हैं।